‘भारत छोड़ो’ आंदोलन पूर्णतः असफल आंदोलन (182 Views)

1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन पूर्णतः असफल आंदोलन था। यह कांग्रेसियों द्वारा गढ़ा एक मिथक है कि इस आंदोलन के कारण ब्रिटिश साम्राज्य की भारत से विदाई हुई थी और भारत स्वतंत्र हुआ था।

उस वक्त का समकालीन इतिहास और लोगो के व्यक्तिगत संस्मरण, यही बतलाते है कि इस आंदोलन को सफलता पूर्वक अंग्रेजो ने कुचल दिया था और कांग्रेसी पूरी तरह से हार की मानसिकता का वरण कर चुके थे। सत्य यह है कि गांधी जी से लेकर समस्त शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व, ब्रिटिश सरकार द्वारा खुले आम, मुस्लिम लीग को प्रश्रय दिये जाने से वे हताश हो चुके थे। उनमें स्वतंत्रता की लड़ाई को और लम्बा खींचने की ऊर्जा भी नही बची थी।

यह भारत का भाग्य कुछ अच्छा था कि इसी काल मे तीन घटनाये या तीन स्थितियां ऐसी बनी, जिसके परिणाम स्वरूप भारत को आधी अधूरी, अंग्रेजो की शर्त पर स्वतंत्रता मिली, जिसमे कांग्रेस का कोई हाथ नही था।

पहला यह कि द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटेन कंगाल हो चुका था और भारत ऐसे एक बड़े देश को उपनिवेश के रूप में संभालने की उसकी आर्थिक स्थिति नही रह गयी थी।

दूसरा यह कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका सुपरपावर बन कर उभरा था और ब्रिटेन, जो युद्ध के शुरू होने से पहले विश्व की बड़ी शक्ति थी, उसकी स्थिति अमेरिका के एक सहायक की रह गयी थी। जिसका, द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषका से उभरना, अमेरिका की सहायता पर निर्भर था। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रूमैन, उपनिवेशवाद के विरुद्ध थे और उनका ब्रिटेन पर पूरा दबाव था कि ब्रिटेन अपने उपनिवेशों को गुलामी से आज़ाद करे।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण नेता जी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा आज़ाद हिंद फौज का गठन और उसका साउथ ईस्ट एशिया में अलाइड फोर्स से युद्ध था। वह लड़ाई INF भले ही बर्मा की सीमा पर पहुंच कर हार गई थी लेकिन उसने भारत मे स्वतंत्रता के लिए अहिंसा के नाम पर हो रहे संघर्ष को औचित्यहीन बना दिया था। इस सेना के गठन और युद्ध ने, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद पहली बार भारतीयों को हथियार उठा कर शत्रुओं पर वार करने के लिए उद्वेलित कर दिया था। 1945 में लाल किले में INF के अधिकारियों पर चले मुकदमे ने भारतीय जनमानस को, अहिंसा को नकारते हुए, एक बार फिर जोड़ दिया था। उसी वक्त बॉम्बे के बंदरगाह में नौसैनिकों के द्वारा ब्रिटिशों के खिलाफ हुए विद्रोह ने, ब्रिटिश साम्राज्य को यह अच्छी तरह समझा दिया था कि यदि उन्होंने भारत से निकल जाने में और देर की तो ब्रिटिश सरकार को भारत मे अपनी जान माल का खतरा होगा।

इसी पृष्ठभूमि में ब्रिटिश साम्राज्य ने अपने हितों की रक्षा के लिये गांधी जी के सहयोग से, सबसे उपयुक्त व्यक्ति नेहरू का चयन किया और अपनी शर्तों पर टूट फूटे भारत की बागडोर उनको पकड़ा कर, भारत को स्वतंत्र कहला दिया।

Popular Articles