राष्ट्र के विनाश में “गद्दारों” की भूमिका (254 Views)

मुझे इसमें कोई शक नहीं कि भारत “ऋषियों और मुनियों” की “कर्मभूमि” रहा है | इसमें भी कोई शक नहीं के भारत उस समय “विश्व गुरु” था, जब विश्व में दूसरे देशों के लोग “भूखे और नंगे डकैती डालते” हुये घूमा करते थे | इसमें भी कोई शक नहीं कि प्राचीन काल से भारत अध्यात्मिक की उस पराकाष्ठा पर रहा है, जहां ईश्वर भी भारत में जन्म लेने के लिए तरसते थे |

लेकिन एक कठोर सत्य यह भी है कि भारत में अलग-अलग समय पर “गद्दार” भी बहुत बड़ी संख्या में रहे हैं | पूरे के पूरे इतिहास में भारतीयों के चरित्र का जब भी विशलेषण करेंगे तो यह पाएंगे कि इन्हीं भारतीयों में से कुछ ऐसे लोग भी रहे हैं | जो अपने थोड़े से क्षणिक स्वार्थ के लिए कभी भी “भारत मां की इज्जत का सौदा” विदेशी आताताइयों के हाथों कर देते थे | मैं इसके कुछ उदाहरण देता हूं |

“मुगल आक्रांताओं” ने जब भी भारत पर आक्रमण किया | तब ज्यादातर वह मुगल आक्रांता आक्रमण के लिये “भारतीयों के आग्रह” पर ही भारत आये थे | उन्हें भारत पर “आक्रमण” के लिये सारी सुविधाओं का सामान भी इन्हीं “गद्दार भारतीयों” ने ही उपलब्ध करवाया था | वह आक्रांता नाम मात्र के बहुत ही थोड़ी संख्या में आकर भारत की सीमाओं पर “गद्दार भारतीयों” के सहयोग से गांव के बाहर बगल में छोटे-छोटे कैंप लगाकर रुका करते थे और “गद्दार भारतीयों” को ही अपनी सेना में भर्ती कर अपनी सेना का विस्तार किया करते थे | इसीलिये उन “विदेशी मुगल आक्रांताओं” की फौज में शीर्षस्थ पदों पर प्राय: भारतीय ही हुआ करते थे | जो भारत के ही खिलाफ युद्ध की योजना बनाते थे और नीचे लड़ने वाले सैनिकों में भी बहुत बड़ी संख्या में भारतीय ही होते थे, जो हिन्दुस्तान के खिलाफ लड़ते थे |

यह वह लोग थे जो हिंदुस्तान के अंदर पैदा हुये थे | उन्होंने हिंदुस्तान का अनाज खाया था, हिंदुस्तान में शिक्षा ग्रहण की थी और उनका परिवार उस समय भी हिंदुस्तान में ही पल रहा था | लेकिन “लूट के थोड़े से धन” के लालच में उन “गद्दार” भारतीयों ने उन विदेशी मुगलों की सेना में जाकर उन मुगल आक्रांताओं शक्ति को बढ़ाया था | जो मुगल जीतने के बाद उन्हीं “गद्दार हिन्दुओं की बहु-बेटीयों को दो-दो दीनार” में बेचा करते थे या उन्हीं “गद्दार हिन्दुओं की लड़कियों को अपनी अय्याशी के लिये अपने हरम में बतौर गुलाम” रखा करते थे और जब वह लड़कियां “बूढी या गर्भवती” हो जाती थी तो उन्हें इन्हीं हिन्दुओं को बतौर “तोहफ़ा” बाँट दिया करते थे |

यही स्थिति कमोवेश अंग्रेजो के समय में भी थी | मात्र 800 अंग्रेज भारत में पूरे “इंगलैंड से चंदा जोड़ कर” व्यवसाय करने के लिए आये थे क्योंकि वहाँ पर उस समय एक भी व्यक्ति इतना संपन्न नहीं था, जो इन 800 अग्रेजों के व्यवसाय के लिये भारत आने का खर्चा उठा सकता | जब अंग्रेजों ने यहां के लोगों के मूल चरित्र को देखा तो पाया कि इस देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें यदि थोड़े से “पैसे का लालच” दिया जाए तो वह अपने “वतन के साथ गद्दारी” करने में भी जरा सा संकोच नहीं करेंगे और अंग्रेजों ने इन्हीं गद्दारों की मदद से हिंदुस्तान के अंदर ही हिंदुस्तानी राजाओं के सेनापतियों और सैनिकों को “सत्ता और धन का लालच” देकर अपनी तरफ मिला लिया और इन्हीं गद्दारों की मदद से बड़े-बड़े रजवाड़े हड़प कर लिये, जिनका खर्चा भी उठाने की औकात इन अंग्रेजों की नहीं थी |

कालांतर में भारत के अंदर बहुत बड़ी संख्या में अंग्रेजों ने “अपने शासन के विस्तार के लिये” भारतीयों को अपने आधीन नौकरी दी और साम्राज्य की जड़ें मजबूत करने के लिये सैनिकों के रूप में भारतीयों को ही अपनी सेना में भर्ती किया | ऐसा करके भारत के ही राजाओं के खिलाफ अपनी “इंडियन ब्रटिश आर्मी” गद्दार भारतीयों के सहयोग से भारत में ही खड़ी कर ली और यह “लज्जाविहीन गद्दार भारतीय” थोड़े से “ऐय्याशी और धन” के लिए इन विदेशी हुक्मरानों के इशारे पर अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर अपने ही लोगों से लड़ने मरने लगे |

1857 के “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता का कारण” भी यही “भारतीय गद्दार” थे | ब्रिटेन ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिये “प्रथम विश्व युद्ध” भी इन्हीं “गद्दार भारतीयों” के दम पर लड़ा था | इन्हीं “भारतीय गद्दारों” की वजह से 1947 में भी भारत को “संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न स्वतंत्रता” प्राप्त नहीं हो सकी और जिसे “स्वतंत्रता” कहा जाता है, वह मात्र ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय नेताओं को किया गया एक “सत्ता का हस्तांतरण” है | जिस पर आज भी कोई नेता किसी भी तरह की कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहता है |

आज भी अगर हम ध्यान से देखा जाए तो हिंदुस्तान की सर जमीन में पैदा होने वाला “गद्दार हिंदुस्तानी” खाता, पीता, रहता, पढ़ता, लिखता तो भारत में है और जब वह देश को कुछ देने लायक बन जाता है, तब वह पैसे के लालच में विदेश में जाकर विदेशियों की शक्ति को बढ़ाने के लिए कार्य करने लगता है और हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों को पिछड़ा और प्रभावहीन कहकर अपमानित करने लगता है | जबकि उसका परिवार या माता पिता अभी भी भारत में ही रह रहे होते हैं |

भारत कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था लेकिन कब तक | जब तक भारतीयों का चरित्र इतना असाधरण था कि हिंदुस्तान की ओर अगर कोई भी व्यक्ति आंख उठाकर देखे तो आम हिंदुस्तानी उस व्यक्ति की आंख निकालने का सामर्थ्य रखता था | जो भी व्यक्ति हिंदुस्तान के विषय में “हेय विचार” प्रस्तुत करता था, उसके निकृष्ट विचारों का वहीं मुंह तोड़ जवाब दे दिया जाता था | लेकिन जब से भारत का स्वार्थी हिंदुस्तानी धूर्त, चरित्रहीन और देश के प्रति गद्दार हो गया है, तभी से भारत निरंतर पतन की ओर जा रहा है, जो पतन का दौर आज भी निरंतर चला आ रहा है |

आज भी आप देखिए जो लोग “विदेशी शक्तियों की शह पर” सत्ता में शक्ति संपन्न हैं | जिनके पास सत्ता को प्रभावित करने की ताकत है | वह अपने “शक्ति प्रदर्शन” के लिए बड़े-बड़े सरकारी बंगलों में रहते हैं और तरह-तरह की विदेश गाड़ियों में घूमते हैं | उनकी सुरक्षा में कमांडो हथियार लेकर उनके साथ चलते हैं | और जो भारत का आम राष्ट्रभक्त नागरिक है, उसका स्वाभिमान और उसकी संपत्ति दोनों ही उसकी नजरों के सामने लूट ली जाती है और वह निरीह कुछ नहीं कर पाता है | न ही कोई उसकी बात सुनने वाला होता है | जैसे “कश्मीरी पंडित” इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं |

अगर हम भारत को फिर से “सोने की चिड़िया” बनाना चाहते हैं तो इन “चरित्रहीन गद्दार भारतीयों” को महिमामंडित करने से बचना होगा और भारतीयों का उपहास करने वालों का सार्वजनिक रूप से बहिष्कार करना होगा |

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