श्री जगतगुरु आदि शंकराचार्य (604 Views)

आदि शकराचार्य आदि शंकराचार्य जी के पिता शिव गुरु जी तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी ब्राह्मण थे । उनके विवाह के कई वर्ष बाद भी उनकी से सन्तान नहीं हुई । उन्होंने अपनी पत्नी के साथ से संतान प्राप्ति के लिए कठोर साधना की। अंततः भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और कहा , ” वर मांगो ” |

 

शिव गुरु ने एक दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ पुत्र मांगा ।
भगवान शंकर ने कहा, दीघ्र आयु वाला सर्वज्ञ नही होगा और सर्वज्ञ दीघ्र आयु का नही होगा । तब धर्म प्रेमी शिव गुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की प्रार्थना की । भगवान शिवने पुनः कहा कि मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहां अवतीर्ण होऊंगा । वैशाख शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन मध्यकाल में दिव्य प्रकाश रूप , अति सुंदर , दिव्य , कान्तियुक्त बालक ने जन्म लिया आदि शकराचार्य जी ने 3 वर्ष की आयु में संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया । पिता के असमय निधन होने पर भी मां ने अपने उत्तरदायित्व के निर्वाह में कोई कमी नही आने दी । 5 वर्ष की आयु में यज्ञोपावित के बाद गुरुकुल भेज दिया गया । 2 वर्ष के कम समय मे कई शास्त्र कंठस्त कर लिए ।

 

गुरु घर मे एक बार वह परंपरानुसार भिक्षा मांगने एक ब्राह्मण के घर गए , वहां खाने के लिए एक दाना भी नहीं था ब्राह्मण की पत्नी ने शंकर के हाथ मे एक आंवला रख कर अपनी गरीबी के बारे में बताया । इसकी ऐसी स्थिति देख कर शंकर का मन द्रवित हो उठा , तब द्रवित मन से उन्हों ने मां लक्ष्मी का स्तोत्र रच निर्धन ब्राह्मण की निर्धनता दूर कर ने की प्रार्थना की । उसकी प्रार्थना से घर सोने के आंवलो की वर्षा हुई |

 

इनके बारे में एक विस्मयपूर्ण कथा आती है कि इनकी मां स्नान के लिए दूर पूर्णा नदी जाना पड़ता था लेकिन वह मार्ग बदल कर इनके घर के पास बहने लगी । बालक शंकर वैदिक ज्ञान की संपदा से कंठस्थ हो अब 7 वर्ष के हो गए , उन्होंने मां से सन्यास के लिए आज्ञा मांगी । मां द्वारा मना करने पर उदास हो गए । एक दिन वह गांव के तालाब में नहा रहे थे कि एक मगरमच्छ की पकड़ में आ गए। बालक शंकर चिल्लाए और कहने लगे मां मेरा जीवन समाप्त होने वाला है, में बच सकता हूँ अगर शेष जीवन के लिए सन्यास में जाने की मुझे अनुमति दे दो ।

 
अब मां के पास कोई भी अन्य विकल्प था। मां ने कहा कि तुम्हारे पिता जी नहीं रहे , मेरी मृत्य पर मुझे अग्नि कौन देगा । बालक शंकर ने मां को आश्वस्त किया कि मां में जहां भी हूंगा लेकिन ऐसे समय तुम्हारे पास ही होगा । मां की अनुमति मिलने पर बालक शंकर ने 7 वर्ष की आयु में सन्यास ग्रहण कर घर छोड़ दिया ।

 
सात वर्षीय सन्यासी बालक शंकर ने अपने भारत के सदूर दक्षिण के केरल गांव कलाड़ी से भारत की विलुप्त होती सनातन धर्म की बहती धारा को पुनः प्रवाह देने के लिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा के लिए पैदल निकल पड़े और नर्मदा नदी के तट पर ओंकारनाथ पहुंचे। वहां तीन वर्ष गुरु गोविंद पाद से योग शिक्षा और अद्वेत ज्ञान प्राप्त करने लगे । तत्पश्चात वह गुरु आज्ञा से वह कांशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए निकल पड़े ।

 
जब वह कांशी जा रहे थे कि एक चांडाल मार्ग में आ गया, उन्होंने चंडाल को मार्ग से हटने को कहा। चांडाल ने उत्तर दिया कि मेरे अंदर भी वही परमात्मा है जो तुम्हारे अंदर है , फिर तुम किसे हटने को कह रहे हो ?
शंकर पीछे हटे और साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और कहा कि आपने जो मुझे ज्ञान दिया है, उससे आप मेरे गुरु हुए । शंकर की आध्यत्मिक चेतना से उन्हें शिव और चार देवो के दर्शन हुए ।

 
ब्रह्म और जीव मूल् में एक ही है इसमें जो अन्तर दिखाई देता है वह हमारा अज्ञान है । ज्ञान का यह अनुभव और उसकी अनुभूति शंकर को एक चांडाल से मिली । आदि शंकराचार्य के जीवन के एक महत्वपूर्ण घटना मंडन मिश्र से शास्त्रर्थ है । मंडन मिश्र की विद्वता की चर्चा सर्वत्र थी , यहां तक पिंजरे मे बन्द पालतू मैना भी संस्कृत बोलती थी । शास्त्रर्थ आरम्भ हुआ , आदि शंकराचार्य ने अपने तर्कों से पराजित कर ही दिया था तभी उनकी पत्नी भारती देवी बोली कि अभी आप की आधी विजय है , क्योंकि अभी आप ने आधे ही अंग को ही जीता है , मुझे हरा कर दिखाओ।

 
मंडन मिश्र की पत्नी ने ब्रह्मचारी आदिशंकराचार्य से कामशास्त्र पर प्रश्न पूछने आरम्भ कर दिए । वह भला कैसे उत्तर देते । आचार्य शंकर ने उत्तर देने की लिए समय मांगा । आचार्य ने तब एक मृत काया में प्रवेश किया और सारी अपेक्षित जानकारी के साथ अपने शरीर मे पुनः प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्नी को उत्तर दिया और उन्हें पराजित किया । आचार्य शंकर ने सनातन धर्म की पुनः स्थापना के लिए अनेक शास्त्रर्थ किये और सम्पूर्ण भारत मे सनातन धर्म को शास्त्र सम्मत स्वरूप दिया महर्षि वेदव्यास जानते थे कि कलयुग में लोगों के लिए स्मृति (स्मरण रखना) और श्रुति ( सुनना ) बहुत कठिन होगा इसीलिए सभी धर्म ग्रंथों को लिपिबद्ध किया ।

 
कलयुग के 2500 वर्ष बाद बुद्ध मत और जैन मत के प्रादुर्भाव से सनातन धर्म और उसके ग्रंथ लुप्त हो गए ।
तब आदि शंकराचार्य जी ने सम्पूर्ण भारत के बौद्धमत और जैन मत के धर्मचारियों को सनातन धर्म के तर्कों और तथ्यों से परास्त कर पुनः सनातन धर्म को स्थापित किया । भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए चार कोनों में चार वेदों के लिए चार मठ स्थापित किया । हर मठ को एक वेद वाक्य के उदघोष से जोड़ा गया ।

 

भारत की आध्यात्मिक एकता का आधार है चार वेदों पर चार मठ।
1) श्रृंगेरी मठ : यह मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में स्थित है। इसके में दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के अंत मे सरस्वती, भारती, पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है, मठ के तहत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वर थे। वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं।

 
2) गोवर्द्धन मठ : गोवर्द्धन मठ भारत उड़ीसा के पुरी में है। गोवर्द्धन मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और इस मठ के तहत ‘ऋगवेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए। वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं।

 
3) शारदा मठ : शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ और इसमें ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79 वें मठाधीश हैं।

 
4) ज्योतिर्मठ : ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में है। ज्योतिर्मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इसका महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य तोटक थे। वर्तमान में कृष्णबोधाश्रम इसके 44 वें मठाधीश हैं।

 
आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों के साथ पूरे देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की भी स्थापना की थी। आदि शंकराचार्य को अद्वैत परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है। उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। हमें अज्ञानता के कारण ही ये दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं।आदि शंकराचार्य का विचार दर्शन :-

अहं ब्रह्मास्मि= मै ही ब्रह्म हूं ।
सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म दोनों में ही हम ब्रह्म के दर्शन, कर सकते हैं।
निर्गुण ब्रह्म उनका ईश्वर निराकार है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है।
जीव अज्ञान व्यष्टि की उपाधि से युक्त है।

तत्त्‍‌वमसि तुम ही ब्रह्म हो;
अहं ब्रह्मास्मि मै ही ब्रह्म हूं;
‘अयामात्मा ब्रह्म’ यह आत्मा ही ब्रह्म है; इन बृहदारण्यकोपनिषद् तथा छान्दोग्योपनिषद वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न है।
ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं।
ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूप तथा आनंद स्वरूप है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप कहा गया है।
।। सम्पूर्ण भारत बसा जिनके ह्रदय में। ।।

शास्त्र ज्ञान से सम्पन 7 वर्षीय शंकर ने विराट और विशाल भारत भूमि को अपने कदमों से नापा. घने जंगलों के खूंखार जानवरों के बीच से , उबड़ खाबड़ मार्ग से , खाइयों , रेगिस्तान की तपती रेत से , हिम गिरी की ऊंची चोटियां से को पार करता हुए उन्होंने दक्षिण में कन्याकुमारी से उत्तर में कैलाश पर्वत तक, पश्चिम में पेशावर से पूर्व में गोहाटी में कामाख्या मन्दिर तक असंख्य नगरों में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म को शास्त्र सम्मत विधि से कलयुग के 2500 वर्ष बाद पुनः स्थापना की और 32 वर्ष की आयु में मोक्ष प्राप्त कर गए ।आदि शंकराचार्य जी ने 7 वर्ष की आयु में जब मां से सन्यास के लिए विदा ली थी तब मां को आश्वस्त किया था कि तुम्हारे देहावसान पर अग्नि देने मै अवश्य आऊंगा ।

 
कलाड़ी गांव में जब वह पुनः आये तब उनकी माताजी का देहांत हुआ । लेकिन तब यह विवाद पैदा हुआ कि एक सन्यासी द्वारा मां का क्रियाकर्म कैसे किया जा सकता है ? इतना ही नही , सभी ने आदि शंकराचार्य का बहिष्कार किया । फलस्वरूप आदि शंकराचार्य को स्वयं ही अत्यंत ही कठिन परिस्थितियों के बीच मां का अंतिम संस्कार करना पड़ा ।
आदि शंकराचार्य जी ने कलयुग के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से समाप्त किया ।

 
उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। हमें अज्ञानता के कारण ही ये दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं।
उनके विषय में कहा गया है-
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्
अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया।

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