सरदार पटेल (3857 Views)

बात खरी है | बात ऐसी है जो देश की पुरानी पीढ़ी का हर कोई जानकार और निष्पक्ष नागरिक मानता है, और बोलता भी है | यदि सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री बने होते, तो कश्मीर, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता आदि कि आग में भारत न जलता | किसानों की समस्याएँ वीभत्स रूप धारण करने से पहले सुलझा ली जाती और भारत की दशा ऐसी न होती |

 

पटेल के तीक्ष्ण विरोध के बाद भी पाकिस्तान को भारत ने अपने बचे 200 करोड़ में से 60 करोड़ भी दिए, और एक तिहाई कश्मीर भी हाथ से चला गया, और अपना 200 करोड़ का कर्जा भारत ने अकेले अपने सर लिया | यूएन में जाने के नेहरु के हठ के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के अधिकार में जो भी बचा खुचा कश्मीर है, वह भी विवादित ही माना जाता है | यही नहीं, पाकिस्तान चले गए मुस्लिमों द्वारा खाली किये गए मकानों में हिन्दू शरणार्थियों को न बसने देने का नेहरु का निर्णय एवं हिन्दुओं एवं मुस्लिमों को एक साथ नहीं अपितु अलग अलग क्षेत्रों में बसा कर मुस्लिम जनसँख्या के छोटे छोटे गढ़ बना देने का निर्णय भी पटेल के विरोध के बावजूद लिए गए |

 

नेहरु ने हिन्दुओं के दान से बने सोमनाथ मंदिर के निर्माण के बाद सरकारी अनुदान देकर अयोध्या के विवादित ढांचे के स्थान पर पूरी मस्जिद बनवाने और रामलला को वहाँ से हटवाने का भी प्रयास किया था, जिसे पटेल ने होने नहीं दिया था | इस घटना का उल्लेख पटेल की पुत्री की डायरी में है |

 

सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्तूबर, 1875 – 15 दिसंबर, 1950) ) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमंत्री थे। सरदार पटेल बर्फ से ढंके एक ज्वालामुखी थे। वे नवीन भारत के निर्माता थे। राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी थे। वास्तव में वे भारतीय जनमानस अर्थात किसान की आत्मा थे।

 

भारत की स्वतंत्रता संग्राम मे उनका महत्वपूर्ण योगदान है। भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। उन्हे भारत का’लौह पुरूष’भी कहा जाता है।

 

सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पीवी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल जम्मू एवं काश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भ भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। किन्तु नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है। अगर काश्मीर का निर्णय नेहरू के बजाय पटेल के हाथ मे होता तो आज भारत में काश्मीर समस्या नाम की कोई समस्या नहीं होती।

 

वल्लभभाई का लालन-पालन विशुद्ध ग्रामीण वातावरण में हुआ। यद्यपि उन्होंने कृषि कार्य नहीं किया परन्तु कृषि एवं पशुपालन परिवार की आजीविका का प्रमुख साधन था। अनिश्चितता ग्रामीण अर्थव्वस्था की एक विशेषता रही है। असाधारण से साधारण राजस्व अधिकारी किसानों को परेशान करते थे।

 

वल्लभभाई पटेल ने किसानों एवं मजदूरों की कठिनाइयों पर अन्तर्वेदना प्रकट करते हुए कहा :”दुनिया का आधार किसान और मजदूर पर हैं। फिर भी सबसे ज्यादा जुल्म कोई सहता है, तो यह दोनों ही सहते हैं। क्योंकि ये दोनों बेजुबान होकर अत्याचार सहन करते हैं। मैं किसान हूँ, किसानों के दिल में घुस सकता हूँ, इसलिए उन्हें समझता हूँ कि उनके दुख का कारण यही है कि वे हताश हो गये हैं। और यह मानने लगे हैं कि इतनी बड़ी हुकूमत के विरुद्ध क्या हो सकता है ? सरकार के नाम पर एक चपरासी आकर उन्हें धमका जाता है, गालियाँ दे जाता है और बेगार करा लेता है।” किसानों की दयनीय स्थिति से वे कितने दुखी थे इसका वर्णन करते हुए पटेल ने कहा: “किसान डरकर दुख उठाए और जालिम का लातें खाये, इससे मुझे शर्म आती है। और मैं सोचता हूँ कि किसानों को गरीब और कमजोर न रहने देकर सीधे खड़े करूँ और ऊँचा सिर करके चलने वाले बना दूँ। इतना करके मरूँगा तो अपना जीवन सफल समझूँगा।”

 

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