स्वामी विवेकानंद (3290 Views)

“मैं भविष्यद्रष्टा नहीं हूँ,न मैं उसके लिए चिंतित हूँ। किंतु, एक दृश्य मेरे सामने बिल्कुल स्पष्ट है, कि हमारी प्राचीन मातृभूमि एक बार फिर जाग उठी है। वह नवयौवन प्राप्त कर पहले से कहीं अधिक भव्य दीप्ती के साथ अपने जगद्गुरु के सिंहासन पर आरुढ़ है। समस्त संसार को शांतिपूर्ण और मंगलमय वाणी से उसका संदेश सुनाओ” |

 

 

देश परतंत्र है, गरीबी – भुखमरी से जूझ रहा है, लोगो में आत्मविश्वास नहीं है, चारो ओर घोर निराशा का वातावरण है | दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं..इन सब के बीच स्वामी विवेकानंद की यह भारत द्वारा विश्व नेतृत्व की घोषणा एक आश्चर्य से कम नहीं थी | स्वामी जी स्वतंत्रता की बात नहीं कर रहे उससे एक कदम आगे विश्वविजय की गर्जना कर रहे थे | स्वामी जी की इस दूरद्रष्टि ने पूरे राष्ट्र में नई चेतना भर दी, लोगो में अपने देश और संस्कृति के प्रति गर्व प्रतिस्थापित हुवा, आत्मविश्वास जगा और तो और स्वामी जी के ये उद्गार क्रांतिकारियों के प्रेरणामंत्र बन गये | स्वतंत्रता तो मिली ही साथ ही यह राष्ट्र एक बार फिर उठ खड़ा हुआ था |

 

 

भारत को भारत के लिये जगाना कठिन है| त्याग ओर सेवा हमारे रग-रग में बसे है, हमारे DNA में है | भारतवासियों को स्वार्थ की बात प्रेरणा नहीं दे पाती है| हाँ लेकिन किसी ओर का भला होने वाला है तो वह तत्पर हो जायेगा | विश्वकल्याण की बात हो, विश्व को मानवता के सामने खड़ी चुनौतियों भौतिकवाद, बिखरते परिवार, जीवन में बढ़ते तनाव, आतंकवाद से बचाना हो तो भारत खड़ा हो जायेगा | स्वामी विवेकानन्द कहते है कि भारत का जीवनध्येय (मिशन) है – विश्व का मार्गदर्शन करना।

 

 

स्वामी जी विदेश यात्रा से जब वापस भारत लौटे तो रामेश्वरम के नजदीक जहाज से उतरते ही समुद्र तट पर रेत में लोट-पोट होने लगे | गुरु भाइयो ने जब पूछा की अब जब आप चार साल तक पाश्चात्य देशों की चमक-धमक और वैभव देखने के बाद लौटे है तो आपका भारत के बारे में क्या विचार है | स्वामीजी ने कहा, “पहले तो में अपनी मातृभूमि से प्रेम ही करता था अब तो इसका कण–कण मेरे लिये तीर्थ है” | स्वामीजी का यह प्रेम केवल भावनात्मक हो ऐसा नहीं था, उन्होंने भारत की आत्मा को पहचाना था, भारत की नियति को देख पा रहे थे| शिकागों व्याख्यान के बाद जब सारा विश्व स्वामीजी की वाह-वाही कर रहा था, लोग उनके दीवाने हो गये थे, जिधर वो जाते लोग उनका स्वागत करते | ऐसे समय में रात में रोशनी से जगमगाये शिकागों में गगनचुम्बी इमारतों के बीच एक बालकानी में खड़े स्वामीजी अपनी मातृभूमि के बारे में सोचते है, अपने शिष्य को पत्र में पूछते है, “मेरे मन में सदा यही विचार आता है कि भारत ऐसा कब होगा ?”

 

 

स्वामीजी भारत को केवल आध्यात्मिकता में ही नहीं वरन सभी क्षेत्रो में विश्व में सर्वोपरि देखना चाहते थे | भारत पूर्णता के साथ विश्व नेतृत्व करेगा यह स्वामी जी का दृढविश्वास था|

 
विज्ञान के क्षेत्र में भारत अनुसंधान करे, आगे आये यह स्वामीजी के प्रबल इच्छा थी| 1893 में स्वामी विवेकानन्द ने जापान से शिकागों जाते समय जहाज पर जमशेदजी टाटा को स्टील प्लांट के साथ देश के युवाओ के लिए “Research Institute of Science” स्थापित करने की प्रेरणा दी, जो बाद में IISc Bangalore के रूप में साकार हुई | पेरिस में विश्व विज्ञान परिषद के समय कई दिनों तक स्वामी जी और जगदीश चंद्र बोस के बीच भारत में विज्ञान के विकास को लेकर चर्चाये हुए | स्वामी जी के प्रेरणा से ही जगदीश चंद्र बोस ने भारतीय विज्ञान को विश्व में एक सम्मानित स्थान दिलाया |

 

 

स्वामीजी कहा करते थे, “प्रत्येक राष्ट्र की एक पूर्व निर्धारित नियति होती है, जिसे उसे पाना ही है, एक संदेश होता है जो उसे विश्व को देना है और एक विशिष्ठ जीवनव्रत है जो उसे पूर्ण करना है। ” कन्याकुमारी में स्वामी जी ने भारत की नियति, संदेश व व्रत का साक्षात्कार किया, “आध्यात्म भारत का संदेश, मानवता को जीवन का विज्ञान सिखाना उसका जीवनव्रत तथा जगद्गुरु का पद भारत की नियति है।”

 

 

उन्होंने अपना जीवन भारत को उसका परिचय कराने में खपा दिया| विश्व मंच पर इस सन्देश को प्रतिष्ठा दिला कर उन्होंने भारत के लोगों को उसके सन्देश से अवगत कराया| यही कारण था कि उनकी हुंकार पर पूरा भारत जग उठा| ख्यातनाम इतिहासकार यदुनाथ सरकार उन्हें भारतीय नवजागरण के पिता के रूप में संबोधित करते है|

 

 

किन्तु केवल सन्देश को देकर ही भारत का कार्य पूर्ण नहीं होगा| उन्होंने भारतीयों को स्पष्ट निर्देश दिया था कि मानवता के कल्याण में भारत का जागृत होना अनिवार्य है| उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था, “क्या भारत मर जायेगा? यदि ऐसा हुआ तो विश्व में से सारी शुभता प्रभुता व मांगल्य नष्ट हो जायेगा| रह जायेगा लालच कि देवता व काम कि देवी का तांडव जिसका पूजन करेंगे छल, कपट, भ्रष्टाचार, पाशविक बल व आतंक| नहीं ! नहीं ! ऐसा कभी संभव नहीं! ”

 

 

यदि आज विश्व में व्याप्त समस्याओं पर दृष्टी डाले तो हम स्वामी जी के इस वचन की सत्यता को देख सकते है| भारत को अपने नियत स्थान पर ना पहुँचाने के कारण आज समूची मानवता वैश्विक आतंकवाद, पर्यावरण के असंतुलन तथा आर्थिक महासंकट से गुजर रही है| जैसा कि किसी एक विचारक ने कहा था, “यदि भारत मर गया तो कौन जियेगा? और यदि भारत जियेगा तो फिर कौन मरेगा?” भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर योगी अरविंद ने कहा था विश्व नेतृत्व करने के लिए ही भारत स्वतंत्र हुआ है| उसे यह करना ही होगा|

 

 

आज यह अवसर उत्पन्न हुआ है कि भारत अपने जीवनवृत का उद्यापन कर अपनी नियति को साकार करें| हर क्षेत्र में भारत के वीर युवा आज अग्रेसर हो रहे है| ज्ञान विज्ञान, आर्थिक विकास, योग व अध्यात्म सभी क्षेत्रों में भारतीयों ने सारे विश्व में परचम गाड़े है| किन्तु एक राष्ट्र के रूप में जब तक भारत एक समर्थ विश्व-शक्ति के रूप में अपने आप को प्रस्थापित नहीं कर देता तब तक भारत के जीवन दर्शन का उपयोग मानवता के लिए पर्याप्त मात्रा में होना संभव नहीं है|

—- Narendra Modi

Popular Articles